जानिए कैसे प्रो. राकेश भटनागर ने संविधान और बीएचयू एक्ट की उड़ाई धज्जियां
(प्रो. राकेश उपाध्याय) : धर्म विज्ञान संकाय में अवैध तरीके से मुसलमान की नियुक्ति कर झूठ बोल रहा है बीएचयू प्रशासन, संसद से पारित बीएचयू एक्ट 1951 को ताक पर रखकर हुई धर्म विज्ञान संकाय में मुस्लिम अध्यापक की नियक्ति।
आप जानकर हैरान होंगे लेकिन यह सच है कि बीएचयू प्रशासन, उसके वर्तमान कुलपति प्रो. राकेश भटनागर बीएचयू के धर्म विज्ञान विभाग में एक मुस्लिम की नियुक्ति के मामले में लगातार झूठ दर झूठ बोल रहे हैं। उन्होंने मार्क्सवादी संस्कृत विद्वान प्रो. राधा वल्लभ त्रिपाठी और राजस्थान के जयपुर स्थित राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में चयनित मुस्लिम अभ्यर्थी को पढ़ा चुके और विगत कुछ साल से बीएचयू में नियुक्त धर्म विज्ञान संकाय में विभागाध्यक्ष प्रो. रमाकांत चतुर्वेदी की मिलीभगत से आरक्षित कोटे के पद पर इस नियुक्ति को अंजाम देकर ओबीसी-दलित हिन्दुओं के अधिकारों पर जहां डाका डाला वहीं मालवीय जी के समय से चली आ रही नियमावली और परंपरा को भी तार-तार कर दिया। धर्म विज्ञान संकाय में ओबीसी-दलित हिन्दुओं की अध्यापक पद पर नियुक्ति का अधिकार मालवीय जी के परिश्रम की देन है क्योंकि पहले हिन्दू धर्म की शिक्षा देने के मामले में गैर ब्राह्मण हिन्दू की नियुक्ति भी नहीं होती थी। मालवीय जी ने 1915 में बीएचयू की स्थापना की तो सबसे पहले फैकल्टी ऑफ थियोलॉजी स्थापित की। इसके द्वारा पूरे विश्वविद्यालय और सभी हॉस्टल के हिन्दू विद्यार्थी सप्ताह में दो दिन हिन्दू धर्म की शिक्षा प्राप्त करते थे। शुरु में धर्म विषय केवल ब्राह्मण शिक्षक पढ़ाते थे लेकिन 1921 में मालवीय जी ने, डॉ. भगवान दास ने सभी हिन्दुओं को धर्म संकाय में अध्यापक बनने का रास्ता साफ किया। मुस्लिम-ईसाई को इसमें नियुक्ति नहीं देने का नियम कभी भी नहीं बदला गया। आज भी बीएचयू एक्ट में दर्ज है कि धार्मिक शिक्षा का नियम पहले की तरह अर्थात 1915 के एक्ट के अन्तर्गत ही दी जाएगी।
गौरतलब है कि विगत 104 साल के बीएचयू के इतिहास में पहली बार धर्म विज्ञान संकाय में(फैकल्टी ऑफ थियॉलॉजी) में किसी मुसलमान शिक्षक की नियुक्ति हुई है। जबकि फैकल्टी ऑफ थियोलॉजी की स्थापना ही केवल हिन्दुओं व बौदध-जैन-सिख आदि की शिक्षा-कर्मकांड उन्हीं के आचार और सुयोग्य गुरूओं के मार्गदर्शन में करने के नियम के साथ हुई है, जिसके साथ बीएचयू के संस्थापक भारत रत्न महामना मालवीय जी ने आजीवन कभी कोई समझौता नहीं किया और ना ही उनके जाने के बाद किसी अन्य सरकार के समय किसी कुलपति ने फैकल्टी ऑफ थियॉलॉजी में गैर हिन्दू को नियुक्त करने की इस परंपरा को तोड़ने की हिमाकत की।
संसद द्वारा स्वतंत्रता के बाद बीएचयू के 1915 में पारित अधिनियम को कुछ संशोधनों के साथ पुनः पारित किया गया। 1915 के बीएचयू एक्ट में 1922, 1930, 1951, 1958, 1966, 1969 तक परिवर्तन किए जाते रहे लेकिन इसमें जो धार्मिक पढ़ाई के सन्दर्भ में जो नियम 1905 में बीएचयू सोसाइटी और 1915 के बीएचयू एक्ट में मालवीय जी ने दर्ज करवाया, उसमें फैकल्टी ऑफ थियोलॉजी में नियुक्ति और अध्ययन के नियमों में कोई बदलाव नहीं किया गया। 1951 में यूनिवर्सिटी कोर्ट में केवल हिन्दुओं को नियुक्त किए जाने के नियम को हटा दिया गया।
1951 में पारित बीएचयू एक्ट की धारा 4 के अनुसार,
4. University open to all races, creed, castes and classes The University shall be open to persons of either sex and of whatever race, creed, caste or class, and it shall not be lawful for the University to adopt or impose on any person any test whatsoever of religious belief or profession in order to entitle him to be admitted therein, as a teacher or student, or to hold any office therein, or to graduate there at, or to enjoy or exercise any privilege there
of except in respect of any particular benefaction accepted the University, where such a test is made a condition thereof any testamentary or other instrument creating such benefaction ; Provided that nothing in
this section shall be deemed to prevent religious instruction being given in the manner prescribed the Ordinances to those who, or, in the case of minors, whose parents or guardians have given their consent there to in writing.
इसमें स्पष्ट अंकित है कि बीएचयू सभी स्त्री-पुरुषों, नस्ल, मत-पंथ, जाति या वर्ग के लिए खुला रहेगा, और विश्वविद्यालय किसी की धार्मिक मान्यता या वृति को लेकर दाखिले में, नियुक्ति में उन विषयों को छोड़कर किसी प्रकार का प्रश्न नहीं करेगा जिनमें किसी विशेष उद्देश्य को लेकर विश्वविद्यालय ने उसके सन्दर्भ में धार्मिक-दान प्राप्त किया हो। इस अनपढ़ की कोई बात उस धार्मिक अध्ययन अनदेश को बाधित नहीं करेगी जो पर्व के आदेश के दवारा परवरतित चली आ रही है कि जो भी. या अल्पवय होने की स्थिति में जिनके अभिभावकों ने लिखित में धार्मिक अध्ययन प्राप्त करने की अनुमति दे रखी हो उन्हें धर्म की शिक्षा दी जाएगी.
(यहां अल्पवय का संकेत रणवीर संस्कृत विद्यालय के बच्चों के लिए है जो आज भी कमच्छा के सेंटर पर वेदपाठ करते हैं. बीएचयू एक्ट के अनुसार वे सभी धर्म की शिक्षा पाप्त करते हैं।)
बीएचयू का संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय जो स्वतंत्रता के पूर्व में प्राच्य विद्या धर्म विज्ञान संकाय के नाम से विश्वविद्यालय के सर्वप्रथम संकाय के रुप में स्थापित है, बीएचयू एक्ट-1951 के अन्तर्गत धार्मिक अध्ययन (Religious Instruction) के लिए ही निर्मित एवं महामना द्वारा पूर्व से ही स्थापित और विधि मान्य है। बीएचयू एक्ट-1951 के अनछेद 4 में से सभी मत-मजहब-धर्मों के लिए खोले जाने के नियम से निर्देशपूर्वक मुक्त रखा गया है।
महामना मालवीय द्वारा बीएचयू की स्थापना के समय से ही धर्मविज्ञान संकाय(फैकल्टी ऑफ थियोलॉजी) की स्थापना संसद के अधिनियम-1915 और 1951 के संशोधन के साथ केवल हिन्दू-सनातनी-वैदिक-शैव-वैष्णव-बौद्ध जैन-सिख आदि भारतीय मत-पंथों के लिए की गई है, इसके बारे में विस्तृत ब्यौरा आगे दिया जाएगा कि किस प्रकार से धर्म विज्ञान संकाय बीएचयू की बुनियाद का सबसे पहला संकाय, सनातनधर्मियों द्वारा उन सनातनधर्मी शिक्षकों के मार्गदर्शन में संचालित और स्थापित है जो न केवल धर्म और उसके समस्त साहित्य व सिद्धांतों में भलीभांति शिक्षित हैं बल्कि उसके समस्त आचार विभाग, कर्मकांड, हवन-यज्ञ, पूजा-पाठ, पौरोहित्य कर्म, वार्षिक सभी धार्मिक विधान को करने और कराने में भी उसी प्रकार दक्ष हैं। धर्म विज्ञान संकाय में विद्यार्थी अध्ययन के साथ अपने धार्मिक कर्मकांड करते हैं, यहां साप्ताहिक अवकाश भी रविवार को न देकर प्रत्येक पखवाड़े की अष्टमी और प्रतिपदा को दिया जाता है। वार्षिक सत्र का प्रारंभ यज-हवन, काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजन-अर्चन, श्रावणी पूर्णिमा के दिन श्रावणी उपाकर्म आदि धार्मिक रिवाज के साथ किया जाता है जिसमें सभी शिक्षक अपने छात्रों के साथ सक्रियता से अनिवार्यतः भाग लेते आ रहे है। यहां के आचार्य परिसर के विशालकाय विश्वनाथ मंदिर की कार्यकारिणी में पदेन सम्मिलित रहते हैं, वरिष्ठ आचार्य ही मंदिर की समस्त गतिविधियां चलाते हैं, मालवीय भवन में आयोजित साप्ताहिक गीता-प्रवचन, पुराण-कथा, नियमित आगवत-कथा सभी कुछ इसी संकाय के आचार्यों की
देख-रेख में चलते हैं।
स्पष्ट है कि स्वतंत्रता के बाद बीएचयू का संशोधित अधिनियम-1951 यथावत रूप से धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था को उसी रूप में चलाए जाने की सीधी अनुमति दे रहा है जो बीएचयू एक्ट-1915 के द्वारा आजादी के समय तक संचालित और आदेशित हो रही थी।
यहां बीएचयू-एक्ट 1915 के प्रावधानों का अध्ययन आवश्यक है। इसमें विश्वविद्यालय की स्थापना का उद्देश्य लिखा गया है कि-यह विश्वविद्यालय साहित्यिक, कलात्मक शिक्षा और कृषि, तकनीकी, वाणिज्य एवं व्यवसायिक शिक्षा प्रदान करने, मौलिक अनुसंधान को बढ़ावा देने, हिन्दू धर्मशास्त्र और धर्म की शिक्षा प्रदान करने, कला, साहित्य, दर्शन, इतिहास, चिकित्सा एवं विज्ञान के अध्ययन को बढ़ावा देने और शारीरिक एवं नैतिक प्रशिक्षण प्रदान करने के की व्यवस्था करने के लिए निगमित अर्थात स्थापित किया गया है। बीएचयू एक्ट-1915 के अनुच्छेद 4 के खंड एक में लिखा है कि -नियमों के अधीन, यह विश्वविद्यालय सभी वर्ग, जाति और पंथ के व्यक्तियों पुरुष-स्त्री) के लिए खुला होगा किन्तु, केवल हिन्दू धर्म से संबंधित धार्मिक शिक्षा प्रदान करने के लिए विशेष प्रावधान
किया जाएगा।
बीएचयू एक्ट-1915 के अनुच्छेद 4 के खंड 2 में लिखा है कि सभी हिन्दू विद्यार्थियों के मामले में हिन्दू धर्म की शिक्षा अनिवार्य होगी, इसका प्रावधान करने के लिए कोर्ट को परिनियम बनाने की शक्ति होगी, साथ ही, जैन, बौद्ध अथवा सिख विद्यार्थियों की धार्मिक शिक्षा के प्रावधान से उपलब्ध कराई गई निधि से विश्वविद्यालय कोर्ट को विशेष व्यवस्था करने की भी शक्ति होगी।
बीएचयू एक्ट-1915 के अनुच्छेद 17 के बिन्दु (घ) में हिन्दू विद्यार्थियों के लिए हिन्दू धर्म की शिक्षा के विशेष प्रावधान का वर्णन है। इसी अनुच्छेद 17 के खंड 5 में लिखा गया है कि हिन्दू धर्म की शिक्षा संबंधी परिनियम को छोड़कर अन्य किसी नियम में संशोधन कुलाध्यक्ष की अनुमति से हो सकता है। इसका तात्पर्य यह है कि फैकल्टी ऑफ थियोलॉजी को बीएचयू एक्ट-1915 ने अन्य कार्यों की तुलना में निर्वाध अधिकार और पूर्ण स्वायता रखी थी। यहां तक कि बीएचयू की कोर्ट और सीनेट में भी फैकल्टी ऑफ थियोलॉजी के अध्यापकों की संख्या सर्वाधिक रखी गई थी। एक्ट-1915 में 1-प्राच्य विद्या और 2-धर्मशास्त्र नामक दो संकाय्यों का स्थापना का नियम वर्णित है।
इसके अनुच्छेद 23 में लिखा है कि कुल 9 संकाय स्थापित होंगे, इसमें 1-प्राच्य विद्या 2-धर्मशास्त्र 3-कला 4 विज्ञान 5-विधि 6-प्रौद्योगिकी 7-वाणिज्य 8-चिकित्सा एवं शल्य 9-कृषि और अन्य संकाय।
कालांतर में प्राच्य विद्या और धर्मशास्त्र संकाय को एकीकृत कर दिया गया और नाम रखा गया प्राच्य विद्या धर्म विज्ञान संकाय। इसी का कालांतर में पुनः नाम बदला गया संस्कृत विद्या धर्मविज्ञान संकाय।
इस प्रकार से बीएचयू एक्ट-1915 और बीएचयू एक्ट-1951 दोनों ही धार्मिक शिक्षा के प्रावधान से जुड़े नियमों को बरकरार रखते हैं।
बीएचयू एक्ट-1951 में दर्ज स्टेट्यूट अर्थात वैधानिक व्यवस्था में स्पष्ट उल्लेख है कि जो अध्ययन-अध्यापन की जो व्यवस्था पूर्व से चली आ रही है, वह उस समय तक वैसे ही जारी रहेगी जैसे कि पहले से चल रही है, जबतक कि इसमें संसद संशोधन न करे। 1951 के स्टेट्यूट अर्थात वैधानिक व्यवस्था के अनुच्छेद 22 में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय को विश्वविद्यालय का प्रथम संकाय नामित किया गया है और इसके सन्दर्भ में तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा एवं संस्कृति मंत्रालय के 8जून1983 पत्रांक संख्या-F1-39/82-DESK(U) का भी उल्लेख है जिसमें मंत्रालय ने इसे विश्वविद्यालय का बुनियादी संकाय मानते हए इसे इसके मूल स्वरूप में चलाए रखने की संस्तुति की है। अर्थात भारत सरकार द्वारा धर्म विज्ञान संकाय के मौलिक सनातन हिन्दू प्रणीत परंपरागत धार्मिक चरित्र पर कभी
कोई आपत्ति नहीं की गई।
स्वाभाविक रूप से बीएचयू के इतिहास में धर्मविज्ञान संकाय प्रारंभ से ही अपने अलग रुख और रूप के लिए जाना पहचाना गया। इसके दो कार्य निर्धारित थे। प्रथम-विश्वविद्यालय के सभी विभागों के हिन्दू विद्यार्थियों और छात्रावास में रहने वाले हिन्दू छात्रों को प्रति सप्ताह दो दिन हिन्दू धर्म की नैतिक व सैद्धातिक शिक्षा सरल रूप में प्रदान करना और 2-धर्म विज्ञान संकाय में परंपरागत रीति से सनातन वैदिक धर्म के अध्ययन-अध्यापन-शोध कर्मकांड को नियमित प्रतिपादित करते रहना। 1966 तक सभी विभागों में हिन्दू धर्म की पढ़ाई सभी हिन्दू छात्रों के लिए अनिवार्य रही। बाद में विभागों के हिन्दू विद्यार्थियों को हिन्दू धर्म-संस्कृति की शिक्षा बंद करने का निर्देश केंद्र
से भेज दिया गया। इसके बाद से धर्म विज्ञान संकाय की गतिविधियां केवल अपने संकाय तक एवं विश्वनाथ मंदिर एवं मालवीय भवन तक सीमित रह गई। विश्वविद्यालय स्थापना के प्रारंभ के वर्षों में जहां केवल परंपरा से प्रशिक्षित बाहमण शिक्षक ही हिन्दू धर्म का पठन-पाठन करते थे वहीं मालवीय जी ने इस नियम में बदलाव कर धर्मविज्ञान संकाय में सभी गैर ब्राहमण हिन्दू शिक्षकों के लिए भी हिन्दू धर्म-संस्कृति की शिक्षा देने का रास्ता साफ किया। धर्म विज्ञान संकाय में कभी गैर हिन्दू और गैर भारतीय मत-मजहबों को अध्ययन-अध्यापन में सम्मिलित होने की अनुमति प्रदान नहीं की गई। यह परंपरा 1916 से 2019 के इस आंदोलन के होने तक निर्वाध चली आ रही है।
संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में अध्यापकों की नियुक्ति को लेकर 1920 में ही महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने नियम स्पष्ट कर दिए थे। इसके पीछे कारण था कि धर्मविज्ञान संकाय की एकेडमिक काउंसिल ने मार्च 1919 में बाकायदा प्रस्ताव पारित कर दिया कि 1-हिन्दू धर्म की शिक्षा सनातन धर्म के आदर्शों के अनुसार ही दी जाएगी, सभी हिन्दू विद्यार्थियों को सनातन धर्म का परिचय देने के लिए एक विशेष संक्षिप्त पुस्तिका तैयार की जाएगी और धार्मिक उपासना और धर्म के अध्ययन के लिए व्यापक पाठ्यक्रम बनाया जाएगा। 2- सनातन धर्म की यह शिक्षा परंपरा से शिक्षित-प्रशिक्षित आचार को मानने वाले ब्राह्मण शिक्षकों दुवारा ही प्रदान की जाएगी और संकाय में केवल वही शिक्षक-प्रशिक्षक नियुक्त हो सकेंगे। किन्तु इस प्रस्ताव पर डॉ. अगवान दास और महामना
मालवीय दोनों ने ही आपत्ति दर्ज कर दी।
फैकल्टी ऑफ थियोलॉजी दवारा पारित इस प्रस्ताव के बिन्दु क्रमांक 2 पर सबसे पहले डॉ. भगवान दास ने आपति दर्ज कराई। वह फैकल्टी ऑफ थियोलॉजी की अकादमिक समिति के सदस्य थे लेकिन प्रस्ताव पारित करने वाले दिन वह बैठक में मौजूद नहीं थे। 6 मई 1919 को दोबारा जब फैकल्टी की मीटिंग हुई तो उन्होंने प्रस्ताव को रद्द करने का लिखित आग्रह सभी के सम्मुख रख दिया। महामना मालवीय जी तब विश्वविद्यालय के प्रो.वीसी थे, जबकि वाइस चांसलर पद पर शिव स्वामी अय्यर नियुक्त थे। बैठक में डॉ. भगवान दास के प्रस्ताव को धर्मविज्ञान संकाय के सभी आचार्यों ने एक सुर से खारिज कर दिया। इस परिस्थिति में बैठक में उपस्थित मालवीयजी ने
रास्ता निकाला और यह प्रस्ताव प्रस्तुत किया कि विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के हिन्दू छाों को गैर ब्राह्मण हिन्दू शिक्षक भी हिन्दू धर्म की शिक्षा दे सकते, क्योंकि अंग्रेजी भाषा में हिन्दू धर्म-संस्कृति की शिक्षा दे सकने वाले ब्राह्मण उस समय पर्याप्त नहीं थे। महामना का यह प्रस्ताव भी फैकल्टी की एकेडमिक काउंसिल में पारित नहीं हो सका। इससे नाराज हो कर डॉ. भगवान दास ने विश्वविद्यालय की एक्जीक्यूटिव काउंसिल में मामले को रखा, एक्जीक्यूटिव काउंसिल ने फैकल्टी ऑफ बायोलॉजी से इस पर जवाब मांगा। फैकल्टी ऑफ थियोलॉजी ने जवाब में नया प्रस्ताव पारित कर भेज दिया कि धर्मविज्ञान संकाय में केवल वही ब्राहमण नियुक्त होंगे जिन्होंने सदाचार
पूर्वक परंपरा से नैष्ठिक होकर हिन्दू धर्म और शास्त्रों की शिक्षा प्राप्त की है और यज्ञआदि कर्म करा सकने में सुप्रशिक्षित हैं। प्रस्ताव में यह भी गया कि यदि योग्य ब्राह्मण नहीं उपलब्ध होते हैं तो कोई भी गैर-ब्राहमण हिन्दू जिसने भलीभांति सनातन पद्धति से वैदिक शिक्षा प्राप्त की है और यज्ञादि में निष्णात है तो उसे फैकल्टी ऑफ थियोलॉजी में अध्यापक नियुक्त किए जाने पर विचार किया जा सकता है।
24 जनवरी 1920 को विश्वविद्यालय की कार्यकारिणी इस मुद्दे पर जब विचार करने के लिए बुलाई गई तो महामना मालवीय जी विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर नियुक्त हो चुके थे। इसके पहले वह प्रो वाइस चांसलर थे। कार्यकारिणी में डॉ. भगवानदास ने मुद्दा उठाया कि फैकल्टी द्वारा नियुक्ति के संबंध में पारित प्रस्ताव तत्काल रद्द किया जाए। बतौर कुलपति महामना मालवीय जी ने रेखांकित किया कि फैकल्टी ऑफ थियोलॉजी को एक्ट के अनुसार जो शक्तियां प्राप्त हैं, उसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार कार्यकारिणी के पास नहीं है। इसका अधिकार यूनिवर्सिटी कोर्ट के पास है जो इस सन्दर्भ में नीति निर्धारण करने वाला विश्वविद्यालय का सर्वोच्च निकाय है।
कार्यकारिणी की बैठक में हालांकि मालवीय जी की अध्यक्षता में प्रस्ताव पारित करते हुए यूनिवर्सिटी कोर्ट के पाले में मामला भेजा गया कि- ‘कार्यकारिणी की ओर से यूनिवर्सिटी कोर्ट से निवेदन किया जाता है कि वह कार्यकारिणी और सीनेट के द्वारा फैकल्टी ऑफ थियोलॉजी को निर्देशित करे कि वह विश्वविद्यालय की नियुक्तियों की नीति में दखल न दे।”
11 दिसंबर 1920 को मालवीय जी की अध्यक्षता में यूनिवर्सिटी कोर्ट बैठक बुलाई गई। बैठक में फैकल्टी ऑफ थियोलॉजी के आचार्यों और डॉ. भगवान दास के बीच बहस गरमा गई। मालवीय जी ने सभी को शांत रहने की अपील की। डॉ. श्रीमती एनी बेसेंट ने राय दी कि फैकल्टी ऑफ थियोलॉजी यूनिवर्सिटी की नियुक्तियों के नियम तय नहीं कर सकती। पुनः बैठक का माहौल बिगड़ गया। मालवीय जी ने सभी को संभालते हुए शांत किया और राय दी कि इस विषय में हिन्दू समुदाय की सभी जातियों से जुड़े विश्वविद्यालय के सदस्यों और वाराणसी में मौजूद वरिष्ठ जनों से ही पूछ लिया जाना चाहिए कि क्या वह किसी गैर-ब्राहण हिन्दू से अपने बच्चों-छात्रों को हिन्दू धर्म संस्कृति की शिक्षा दिलवाना पंसद करेंगे? मालवीय जी ने अपनी राय देते हुए कहा कि मेरी राय में किसी भी जाति का हिन्दू हो, वह अपने बच्चों को हिन्दू धर्म की शिक्षा सुयोग्य शिक्षित बाहमण से प्राप्त करने को प्राथमिकता देगा, किसी गैर-ब्राह्मण से शिक्षा प्राप्त करना वह पसंद नहीं करेगा। हालांकि मालवीयजी ने यह भी कहा कि फैकल्टी ऑफ थियोलॉजी ने प्रस्ताव पारित कर मर्यादा का अतिक्रमण किया है। हिन्दू धर्म की शिक्षा बच्चों को कौन देगा या नहीं देगा, यह तय करना विश्वविद्यालय कोर्ट का अधिकार क्षेत्र है ना कि फैकल्टी ऑफ थियोलॉजी के आचार्यों का। मालवीय जी की अध्यक्षता में बाद में बीएचयू कोर्ट ने प्रस्ताव पारित कर दिया कि किसी योग्य गैर ब्राह्मण हिन्दू को फैकल्टी ऑफ थियोलॉजी में हिन्दू धर्म-संस्कृति के अध्ययन-अध्यापन में नियुक्ति पाने से नहीं रोका जा सकता। स्पष्ट है कि गैर-ब्राह्मण हिन्दुओं को तो धर्म विज्ञान संकाय में अध्यापक नियुक्त किए जाने पर नियम तय हो गया लेकिन इसके अंतर्गत किसी गैर हिन्दू अर्थात मुस्लिम या ईसाई को नियुक्त करने की अनुशंसा बीएचयू एक्ट के किसी भी रूप चाहे वह 1915 का हो या 1951 का या कोई और, किसी भी स्तर पर नहीं की गई।
अर्थात परंपरा के अनुसार और नियम-कानून-एक्ट के अनुसार धर्मविज्ञान विभाग में कोई गैर-हिन्दू नियुक्ति का पात्र नहीं हो सकता। सवाल है कि आखिर इसे विज्ञापन में स्पष्ट क्यों नहीं किया गया? 1965 तक विज्ञापनों में इस बात का उल्लेख रहता था कि वैदिक सनातन विद्या धर्म और संस्कृति में श्रद्धा रखने वाले-आचार का पालन करने वाले शिक्षित आचार्य ही आवेदन की अर्हता रखते हैं। बाद में यह किस निर्देशसे विज्ञापनों से हटा दिया गया, किसी को जानकारी नहीं है। नियम के स्थान पर इसे अलिखित परंपरा बताया जाता है कि यहां केवल हिन्दू-जैन-बौद्ध ही पढ़ेगा और अध्यापक पद पर हिन्दू व अन्य जैन-बौद्ध-सिख ही यहां नियुक्त हो सकेगा।
मालवीयजी ने इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए ही कालांतर में कला संकाय में अलग से संस्कृत विभाग की स्थापना करवा दी ताकि संस्कृत में रुचि रखने वाले सभी गैर हिन्दू ईसाई-मुस्लिम छात्र और अध्यापकों के लिए संस्कृत के पठन-पाठन का विकल्प सदा उपलब्ध रहे। किन्तु उन्होंने जीवित रहते हए कभी धर्मविज्ञान संकाय की मर्यादा और गरिमा को ठेस नहीं पहुंचने दी। आजादी के बाद की अन्य सरकारों के समय भी यह मर्यादा बनी रही।
(बीएचयू से प्रकाशित हिस्ट्री ऑफ बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी एवं बीएचयू से ही प्रकासित Mahamana BIOGRAPHY VOL-1. एवं BANARAS HINDU UNIVERSITY-ACT AND STATUTES, बीएचयू प्रेस से प्रकाशित पुस्तकों से सत्य रूप में सभी जानकारी दी गई है)
प्रो. राकेश भटनागर ने संविधान और बीएचयू एक्ट की धज्जियां उड़ा दी।
यहां तक कि 1980 के दशक में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के समय एक बार बीएचयू के कुलपति के रूप में एक प्रो. सुरेंद्र सेन नामक व्यक्ति का चयन हो गया था। जैसे ही इस आशय का सूचना पत्र बीएचयू में पहुंचा तो जानकारी मिली की मिस्टर प्रो. सुरेंद्र कई दशक पूर्व ईसाई धर्म अपना चुके हैं। इस समाचार ने जंगल में आग की तरह वाराणसी को हिलाकर रख दिया। बीएचयू में शिक्षक-छात्र सभी गुस्से में आकर अनशन करने लगे। तब प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के संकेत पर प्रो. सुरेंद्र ने स्वयं ही कुलपति पद पर ज्वाइन करने से लिखित इकार कर दिया और एक बड़े धर्म-संकट से तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने बीएचयू को बाहर निकाल लिया। प्रश्न है कि क्या वर्तमान केंद्र की बीजेपी सरकार विश्वविद्यालय को इस नए धर्म संकट से बाहर निकाल पाएगी जबकि जेएनयू से आए कुलपति और उनके मित्र मार्क्सवादी कारिंदों ने पूरे एक्ट की ही धज्जियां उड़ाकर रख दीं। धर्मविज्ञान संकाय को आत्महत्या के कगार पर पहुंचा दिया गया और आरएसएस समेत राष्ट्रवाद के बड़े पुरोधा दिल्ली में सब खामोशी से देखते रहे। आखिर जेएनयू से पधारे कुलपति प्रो. राकेश भटनागर के पास इन सवालों का क्या जवाब है कि
1- बीएचयू के इतिहास में पहली बार अध्यापक पद की सेलेक्शन कमेटी की संस्तुतियों को बगैर एक्जीक्यूटिव काउंसिल के सामने पेश किए सीधे अवैध रूप से लिफाफा खोलकर इंटरव्यू के अगले दिन ही नियुक्ति पत्र देने और ज्वाइनिंग कराने का खेल क्यों खेला जा रहा है। कहा जा रहा है कि एक्जीक्यूटिव काउंसिल से कुलपति जी ने अधिकार ले लिया है कि इंटरव्यू कराकर फौरन लिफाफा खोल दे और ज्वाइनिंग करा दें। जबकि बीएचयू एक्ट 1951 में इसका निषेध है। नियुक्ति की प्रक्रिया के नियम तय हैं। बीएचयू एक्ट1951 के स्टेट्यूट 27(1)(a) के अनुसार, there shall be selection committee for making recommendations to the executive council for appointment to the posts of professors, readers, lecturers teaching post…इसी में पैरा स्टेटयूट 27(1 ) में लिखा है कि – that the proceedings of the selection committee shall not be valid unless-(2) the procedure to be followed a selection committee in making recommendations shall be laid down. (3) If the executive council is unable to accept any recommendation made the selection committee, it shall record its reasons and submit the case to the Visitor.
कुलपति राकेश भटनागर पहले हैं जो खुद ही चयन समिति है, खुद ही एक्जीक्यूटिव काउंसिल भी हैं। खुद को ईमानदार, नियमों से चलने वाले मसीहा घोषित करते हैं जबकि नियुक्तियों में कहीं भी बीएचयू-एक्ट में निर्देशित पंक्तियों का अनुपालन नहीं किया गया। सवाल है कि चयन समिति को जब अपनी संस्तुति एक्जीक्यूटिव काउंसिल के सामने पेश करने का नियम है तो इसमें पहले से ही यह अधिकार कैसे प्राप्त कर लिया गया कि आप रोज इंटरव्यू करिए और रोज लिफाफा खोलकर बगैर काउंसिल को बताए ही ज्वाइनिंग भी करवा दीजिए। धर्म विज्ञान संकाय में पैदा हुआ संकट रुक गया होता अगर नियम का पालन किया गया होता। इससे एक्जीक्यूटिव काउंसिल के
संज्ञान में बात आती और ज्वाइनिंग के पहले ही कोई भी काउंसिल का सदस्य इस नियुक्ति को चुनौती देकर मामला एक्ट के नियमानुसार विजिटर यानी राष्ट्रपति के सुपुर्द कर सकता था। किन्तु कुलपति के मनमाने रवैये ने एक्जीक्यूटिव काउंसिल को और बीएचयू एक्ट को ही डिफंक्ट कर दिया है। यह सोचा समझा अपराध है और यह किसके इशारे पर किया गया, इसकी सीबीआई से जांच से ही मामले का राजफाश हो सकता है। क्योंकि एक्जीक्यूटिव काउंसिल के सम्मुख नियुक्ति की संस्तुति पेश किए बगैर नियुक्ति का लिफाफा खोला जाना बीएचयू एक्ट का सीधा उल्लंघन है। बीएचयू एक्ट में कहीं नहीं लिखा है कि एक्जीक्यूटिव काउंसिल कुलपति को यह अधिकार दे सकती है कि वह उसे नियुक्तियों का ब्योरा साझा किए बगैर ज्वाइनिंग करा दें। क्योंकि इससे विजिटर की शक्ति का सीधा उल्लंघन होता है। नियुक्ति के जो मामले विजिटर की मंजूरी के लिए भेजे जाने चाहिए, जैसा कि मुस्लिम शिक्षक की नियुक्ति के मामले में होना था, उसका रास्ता बंद करने का अक्षम्य अपराध कर कुलपति ने राष्ट्रपति के अधिकार और संसद की अवमानना का अपराध भी किया है।
2- कुलपति राकेश भटनागर अपनी मार्च-अप्रैल 2018 में अपनी ज्वाइनिंग के दिन से 15 नवंबर 2019 तक विगत 20 महीनों के कार्यकाल में एक बार भी मालवीय भवन झांकने तक नहीं गए। मालवीय भवन में धर्म विज्ञान के आचार्यों ने उन्हें दर्जनों बार गीता प्रवचन में हिस्सा लेने, गीता पर बोलने के लिए बुलाया लेकिन वह नहीं गए। मालवीय भवन में यज्ञ-हवन, भागवत कथा में हर कुलपति हिस्सा लेते आए हैं, यह महोदय कभी बुलाने पर भी नहीं गए। यह तो इनकी आस्था है मालवीय जी के मूल्यों और उनके जीवन और उनके विश्वविदयालय के प्रति। इसके विपरीत हर सप्ताह वह गुरुवार की शाम बीएचयू छोड़कर जेएनयू या विदेश रवाना होने के आदी रहे हैं, अगले सप्ताह मंगलवार सुबह से ही वह कार्य पर उपस्थित रहते हैं। यानी प्रत्येक सप्ताह केवल 3 दिन ये बीएचयू में रहते है, बाकी जेएनयू में। इसी बीच कई बार तो महीनों विदेश भी घूम आए। ये रुकते तभी हैं जब नियुक्ति परकिया चलती है। इनके क्या किसी के सामने केवल हाथ जोड़कर चिरारी मुद्रा में सदा खड़े रहने वाले रेक्टर को इन्होंने नियुक्त कर परिसर से अनुपस्थिति रहने की मंजूरी ले रखी है। इनकी उपस्थिति पंजिका देखकर पता चल जाता है कि महोदय को बीएचयू और अपने दायित्व से कितना लगाव है। 2018 में एन 15 अगस्त के एक दिन पहले बगैर झंडारोहण किए महोदय अमेरिका रवाना हो गए और वहां ड्रिंक करते और महिलाओं के साथ डांस में हिस्सा लेने में अग्रणी दिखे जिसकी वीडियो वायरल हो गई। महोदय दिल्लीसे जब भी बीएचयू आते हैं तो जेएनयू से संदिग्ध लोगों
को इनके साथ आते हुए और परिसर में, कुलपति निवास और गेस्ट हाउस में रात्रि विश्राम करते हुए देखा जा सकता है। पीएमओ और एचआरडी के कुछ अफसरों से इनका याराना गहरा है, इस सांठगांठ की ही देन है कि वह मनमाने ढंग से दिसंबर 2019 तक सारी नियुक्तियां पूरी कर, सबके साथ माल बटोरकर कार्यकाल पूरा होने के 9 महीने पूर्व बीएचयू के धर्म संकाय का इस्लामीकरण कर यहां से रफूचक्कर होने के मूड में आ चुके हैं। इनके द्वारा की गई अधिकांश नियुक्तियों में आवेदकों को 1 मिनट या 2 मिनट में ही इंटरव्यू कर विदा किया गया है। ऐसे में नियुक्तियां किस तरह से की गई है, सब स्पष्ट है। भारी धन उगाही बाहर की एजेंसियों के जरिए की गई है।
3- कुलपति महोदय को बीएचयू में कोई शिक्षक योग्य नहीं दिखता। कोई छात्र यहां योग्य नहीं दिखता। अधिकांश नियुक्ति में बंगाल, दक्षिण भारत का बोलबोला है। जेएनयू से उत्तीर्ण है तो सबसे अच्छा है। बीएचयू के विभागों में बीएचयू के टॉपर एक भी चयनित नहीं किए गए, आखिर क्यों? बीएचयू के छात्र कुलपति को बिल्कुल फिसड्डी लगते हैं। कुलपति का कहना है कि बीएचयू को इंटरनेशनल लेवल पर लाना है तो इसे बिहार और यूपी के उपद्रवी और बीमारु राज्य के अयोग्य लोगों से मुक्ति दिलाना सबसे बड़ा काम है और मैं इसे करके रहंगा। बिहार और यूपी के पूर्वांचल को कुलपति केवल माफिया और उपद्रवी लोगों की जन्मभूमि बताते घूमते हैं, बनारस के विद्वानों को
फर्जी बताते हैं, बीएचयू के सनातन धर्म प्रेमी शिक्षको को पागा पंडित कहते हैं। कोई भाषण नहीं जिसमें बीएचयू की परंपराओं का मजाक बनाते है जेएनयू की खुली तारीफ करते। बीजेपी और आरएसएस के नेताओं के लिए ऐसी भद्दी और अभद्र भाषा कि इन लोगों ने सब बरबाद कर दिया। प्रधानमंत्री के बारे में भी गलत शब्द निकालते रहते हैं कि कुलपति महोदया तब भी एचआरडी और पीएमओ से इन्हें पूरा वरदहस्त प्राप्त है।
ऐसे कुलपति और उनके समस्त कारिंदों के खिलाफ बीएचयू एक्ट की अवहलेना करने पर फौरन संसद की अवमानना का केस दर्ज करना चाहिए। धर्मविज्ञान विभाग सनातन धर्म की आस्था का भी केंद्र है, इस आस्था और धार्मिक भावना को आहत करने का मुकदमा भी बनता है। भष्टाचार के लिए तो सीधे सीबीआई जांच इनके खिलाफ होनी चाहिए। और इनके द्वारा की गई नियम विरुदध नियुक्तियों पर केंद्र सरकार को फौरन रोक लगाकर जांच बैठानी चाहिए। ये अब तक नक्सली को प्रकृति के 13 अध्यापकों की नियुक्ति बीएचयू में कर चुके हैं। जेएनयू से उत्तीर्ण 146 लोगों को विभिन्न विभागों में अब तक इन्होंने अध्यापक नियुक्त कर दिया है। इसके परिणाम क्या
होंगे और क्या हो रहे हैं, सब दिख रहा है। समय सबकी खामोशी का हिसाब जरूर लेगा। जरुर लेगा। प्रधानमंत्री जी, एचआरडी मंत्रीजी, राष्ट्रपति जी आप लोग अब भी खामोश रहेंगे?
(प्रो. राकेश उपाध्याय)



